शनिवार, 19 सितंबर 2015


                                  आन्ता

बहुत दूर तक वो मेरा पीछा करती रहीं। उनकी छुअन मेरे रोंगटे खड़े कर रही थी, मेरे क़दमों को लड़खड़ा रही थीं। एक पल को मुझे यूं भी लगा जैसे वो मेरी पीठ को चीरकर मेरे दिल तक पहुंच गई हों और उन्होंने मेरी धड़कन को अपनी गिरफ़्त में ले लिया हो। पर अफसोस धड़कन तब भी नहीं रुकी, और तेज़ हो गई जैसे वो भी भाग जाना चाहती हो उन आंखों की छुअन से।
उफ्फ,!! भला दो निगाहों में इतनी ताक़त कैसे हो सकती है कि वो भागते क़दमों को भी अपनी गिरफ़्त में ले लें। ज़रूर वो जादुई थीं वरना मैंने ऐसी आंखें इस जन्म में तो नहीं देखी थीं। सवालों की एक लंबी फेहरिस्त थी उन आंखों में। ठीक है। पर मुझसे क्या चाहती थीं वो? क्यों इस तरह मुझे असहज बना रहीं थी वो? क्यों मेरा पीछा कर रहीं थी वो और मैं? मुझे क्या हो गया था उन आंखों की छुअन से कि मैं और मेरी आराम से चलती सांस ठहर सी गई थी कुछ देर के लिए?...
.. कुछ तो था जो मेरी समझ के परे था। पर था ज़रूर कुछ ऐसा जो शायद मेरी ज़िंदगी का ही नहीं मेरी आत्मा का भी अंश था... वो रात यूं ही अंधेरों में रौशनी तलाशते हुए गुज़र गई और वो आंखें रात भर मेरे दिमाग़ में चक्कर लगाती रहीं पर नतीजा कुछ नहीं था..
         मैंने पढ़ा था कि अनगिनत भाषाओं में से चिरस्थायी कहें तो सिर्फ एक भाषा होती है, और वो है स्पर्श की भाषा। छुअन की भाषा। देह जिसे स्पर्श करती है उसका भाव, उसका गुणधर्म आत्मसात् कर लेती है। मस्तिष्क भूल जाता है पर देह नही भूलती। देह समाप्त हो जाती है पर उसकी स्मृतियां नहीं मरतीं। उसकी भाषा नहीं मरती। हर जन्म में उसकी युगों पुरानी, जन्मों पुरानी छुअन अपने चिरस्थायी होने का असर दिखा ही देती है। कभी उंगलियों की बनावट में, कभी लहज़े में और कभी गहरी निगाहों में। देह की भाषा है देह को छोड़कर कहां जाएगी? कभी दर्द के रूप में, कभी कंपन के रूप में देह संकेत करती है बहुत कुछ। अतीत और वर्तमान तो क्या भविष्य तक का संकेत दे देती है देह। पर इससे पहले कि हम कुछ समझें बहुत कुछ घट जाता है। उन आंखों की छुअन को मुझे एेसे ही लगा जैसे मेरी देह सदियों से जानती है बहुत अच्छे से पहचानती है। हां मेरा मस्तिष्क ज़रूर उन आंखों को भूल चुका था पर उन आंखों का गहरा स्पर्श शायद उसे अबतक याद था तभी तो वो ख़ुद भी बेचैन था और मेरी पूरी देह को बेचैन कर रहा था।
हर बात अपनी मां से शेयर करने वाली मैं नहीं समझ पा रही थी कि किसी से भी क्या कहूं। कुछ मेरी भी तो समझ आए कि यह सब क्या हो रहा है आजकल मुझे। राह चलते न जाने कितने लोगों से सामना होता है। पर मस्तिष्क में अब तक कोई ऐसे नहीं अटका था। उसकी वो आँखें, गहरी निगाहें वो जैसे मेरे मन को कुुरेद रहीं थीं। मुझसे कुछ कह रही थीं पर मैं नहीं समझ पा रही थी कुछ भी। बहुत असहज सी स्थिति थी यह। ... सबकुछ समझ के परे था। वो व्यक्ति जिसकी आंखों में मैं गुम हो चुकी थी, न जाने कौन था पर उसकी आंखें मुझसे परिचय स्थापित कर रही थीं।
हफ़्ता बीत गया, महिना और बीतते बीतते पूरे दो साल बीत गए। घटना कुछ पुरानी हो गई। पर वो आंखें नहीं बीतीं। मेरे मस्तिष्क में वो वैसे ही छाई हुईं थीं जैसे उस दिन जब वो मुझसे पहली बार मिली थीं और जब मैं उनसे भाग जाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। पर सच तो यह है मेरा मस्तिष्क उनमें कोई संबंध खोज रहा था और मैं उन्हें खोज रही थी अपने विगत में, अपने अतीत में। पर हासिल कुछ नहीं था सिवाय शून्य के।
पर उस दिन वो मुझे फिर मिलीं। मेरे घर के पास। जाने क्या था उनमें अजीब सा पैनापन कि लगा कि अंदर तक कुछ गहरे चुभ गया हो..अचानक ऐसा लगा जैसे सब कुछ घूम रहा है। घर, आकाश, ज़मीन सबकुछ। और फिर एक गहरा काला अंधेरा मेरी आंखों में समा गया। और फिर....... मुझे कुछ याद नहीं।
जब आंखें खुलीं तो देखा बिस्तर पर हूँ और सिर मां की गोद में। वो मुझे सहला रहीं थीं। मुझे होश में आया देख वो दुलारकर मुझसे बोलीं-_सोना, मेरी गुड़िया, मेरी रानू ....क्या हो गया था तुझे? देखो  सब कितने परेशान हो गए थे और अान्ता!! सोना, मेरी गुड़िया तुझे आन्ता...कहते कहते मां सुबक पड़ीं और कमाल हैै पापा ने भी कुछ नहीं कहा बस मां का हाथ अपने हाथ में ले लिया। कहते भी कैसे कुछ। दुनिया के स्ट्रांगेस्ट पापा आज खुद भी तो सुबक रहे थे... बच्चों की तरह।
मां क्या हुआ आप लोग एेसे क्यों बिहेव कर रहेे हो। हुआ क्या? मुझे नहीं समझ आ रहा था कि ये सब हो क्या रहा है? मां ने अपने आंसू पौंछते हुए कहा - कुछ नहीं सोना। सब ठीक है और मेरी ओर बगल में रखा दूध का गिलास बढ़ाते हुए बोलीं- चलो उठो दूध पी लो। कुछ नहीं खाया तुमने कलसे। मां जब ज्यादा दुलार करती हैं तो सोना, रानू और भी न जाने क्या क्या कहती हैं मुझे। तब मुझे लगता है कि ज़रूर कुछ बात है कि मां इतना प्यार जता रही हैं। इसीलिए कुछ आशंकित होते हुए मैंने कहा-  मां ये सब क्या है आप लोग ऐसे परेशान मत हुआ करो। कुछ नहीं हुआ मुझे मैं ठीक हूं। और आप न हंसते रहा करो बस। ओके। हां ठीक है। अब दूध पी लो प्रवचन हो गया हो तो। अबकी पापा बोले आवाज़ मेें बनावटी कड़कपन के साथ, जो कि साफ पता चल रहा था कि बनावटी है। अंदर तो कुछ और ही चल रहा था उनके जो वो छिपा नहीं पा रहे थे। पी रही हूं पापा कहते हुए मैंने गिलास मुंह से लगा लिया। मैैं जानती थी किसी के पेट में भी अन्न का दाना तक नहीं जाने वाला जब तक मुझे न खिला-पिला दें। उफ्फ प्रेम भी क्या चीज़ है। कितना असहाय बना देती है इंसान को। अब मांपा को ही देख लो। उनकी खुशी मुझ पर ही आश्रित है। मेरा चेहरा देख कर ही उनका दिन तय होता है। मांपा मैं भी आपको बहुत चाहती हूं। आप मेरी ज़िंदगी हो मांपा। पर मैं बहुत बुरी बेटी हूं मांपा। बहुत रुलाती हूं न आपको...दिमाग में यही सब चल रहा था कि जैसे एक झटका सा लगा और दिमाग़ में बिजली सी कौंध गई। मैंने दूध का गिलास एक ओर रखते हुए कहा-मैंने आन्ता को देखा मां.. मां मैंने आन्था.....कहते हुए मेरा गला रुंध गया। वो आन्ता... उसकी आंखें...मां वो आन्ता ही है.....मां........मां ने सुबकते हुए मुझेे अपने सीने से लगा लिया और बोलीं सोना तुझे सब याद आ गया...मैं मां के सीने से लगी बिलख रही थी। दो वर्ष पुराना वो अतीत जो मेरेे मस्तिष्क में जमकर बैठा था आज मेरी आंखों से पिघल पिघल के बाहर आ रहा था। गहरे अंदर से उठी कोई बहुत दर्दीली सी चीज़ जैसे मेरे गले से बाहर आ जाना चाह रही थी। पर अफसोस वो दर्दीली चीज़ जिसे शायद कलेजा कहते हैं, बाहर नहीं आया। कुछ बाहर आया तो वो अतीत, वो निगाहें जिनसे अनजाने ही.. मैं न जाने कबसे भाग रही थी। उफ्फ.. वो आंखें..वो गहरी निगाहें मेरे आशू, मेरे एंटोन की थीं जिनमें मेरी पूरी दुनिया समायी हुई थी। मेरी सुबह, मेरी शाम, मेरी पूरी ज़िंदगी जैसे उन भूरी आंखों के घेरों में खो गई थी वही आंखें.. जो मेरे दो साल के निक्कू के चेहरे में झलकती थीं, उफ्फ उनसे मैं कैसे दूर हो गई.. आह...... मेरी आत्मा का अंश, मेरी जान का टुकड़ा , मेरा मासूम सा निक्कू अपनी तोतली आवाज़ मेें आशू अपने प्यारे पापा को आन्ता कह कर बुलाता था। जब मैं आशू को उसकी बातों में छिपी कहानियों की वजह से एंटोन कहती थी तब निक्कू एंटोन कहने की कोशिश में आन्ता कहता और तब मैं और आशू बहुत हंसते..और फिर मैंने भी आशू को आन्ता कहना शुरू कर दिया था एन्टोन की जगह...जब मैं आशू को आन्ता कहती तो मेेरा सोना, मेरा छोटा सा निक्कू बहुत हंसता......... और फिर एक गहरा अंधेरा...... निक्कू अपने पापा की उंगली पकड़कर जा रहा है... पार्क...पर वो अपने आन्ता के साथ लौटा क्यों नहीं..मुझे..अपनी मां को बिना कुछ कहे वो चला कहां गया??.. उसका आन्ता कहां था जब मेरा छोटा सा निक्कू झूले से गिर गया था। आह.... वो पैना दृश्य जबकि  निक्कू अपने आन्ता के हाथों में हमेशा के लिए सो गया था, मेरे मस्तिष्क और आंखों में क्या ज़बान तक में जम गया था.. और..और मैं और उसके आन्ता उसे...उसे नहीं जगा पाए!! निक्कू जिसकी आंखें बिलकुल अपने आन्ता जैसी थीं कहां चला गया अचानक एेेसे...? ज़िंदगी के वो दो वर्ष जिन्हें मैं भुला बैठी थी अपनी पूरी तकलीफ़ के साथ मेरी ज़िंदगी में फिर से लौट आए थे।
अब से कुछ क्षणों पहले अपने मांपा को अपने लिए दुखी होता देख मैं सोच रही थी कि प्रेम इंसान को असहाय बना देता है। पर नहीं प्रेम केवल इतना ही नहीं करता। वो अगर करनेे पर आए तो व्यक्ति को विक्षिप्त तक बना डालता है...
मैंने महसूस किया कि मेरी हथेलियों को किसी ने अपनी हथेलियों में छुपा लिया है। अपनी गहरीली आंखों में ढेरों समुंदर समाए वो आशू था पर अफसोस उसकी आंखों में मेरा आन्ता नहीं था..


शनिवार, 4 जुलाई 2015

कुछ नहीं है 


घुंघराले बाल, खुशनुमा प्यारी हीरे सी चमकदार आंखें और आंखों में झलकती एक अल्हड़ मासूमियत। 
दीदी मैं आपके साथ मैट्रो में चलूंगा और फिर हम लोग चिड़ियाघर चलेंगे। कितने सारे जानवर होते हैं न वहां पर!! कितना मज़ा आएगा न। उसकी बात सुनकर मैंने कहा कि हां वो तो ठीक है पर मैंने सुना है कि जबसे चिड़ियाघर वालों को पता चला है कि तुम दिल्ली आए हो, उन्होंने तुम्हारे लिए भी वहां एक पिंजरा बनवा के रख लिया है। इसलिए कहीं ऐसा न हो कि वो तुम्हें पकड़कर पिंजरे में डाल दें। फिर क्या होगा?
मेरी बात सुनकर अंशुल खिलखिलाकर हंस पड़ा और बोला। दीदी आप भी न। मुझे क्यों पकड़ेंगे मैं कोई जानवर लगता हूं क्या?
अंशुल की बात सुनकर मैंने बनावटी गंभीरता से कहा कि मुझे तो तुम कुछ कुछ इंसान जैसे लगते हो पर शायद उन्हें नहीं लगते तभी तो उन्होंने तुम्हारे लिए पिंजरा बनवाया है। 
हां दीदी पर उन्हें भी नहीं लगूंगा। मेरी कोई पूंछ थोडे़ ही है। 
उसकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई। मैंने कहा कि बस यही अंतर है तुममें और चिड़ियाघर के जानवरों में। वैरी गुड।। फिर तो उन्होंने बिल्कुल ठीक किया। मैं सोच रही हूं कि मैं ख़ुद ही तुम्हें चिड़िया घर  छोड़ आऊे़़़़़   बेकार में चिड़ियाघर वाले परेशान होंगे।।
अपना मज़ाक उडते देख अंशुल चिड़चिड़ाते हुए बोला- दीदीईईईईई अच्छा सुनो न। सीरियस होके सुनो। 
मैंने सिर हिलाते हुए कहा चलो अच्छा ठीक है पर तुम्हीं ऐसे बात करते हो तो मैं क्या करूं। 
अच्छा चलो अब मेरी प्लानिंग सुनो कि मुझे दिल्ली में क्या-क्या घूमना है और आप मुझे घुमाने ले जाओगी। अंशुल ने मेरा हाथ खींचते हुए कहा। 
मैंने भी उसी के अंदाज़ में कहा- ओके। चिड़ियाघर भी?????
दीदीईईईई । 
अबके मैंने कुछ सीरियस होकर कहा-ओके अच्छा चलो बताओ। 
अंशुल छोटी-छोटी उंगलियों पर गिनाते हुए मुझे बता रहा था कि हमें मैट्रो में घूमना है, कुतुबमीनार में घूमना है और    हां लालकिले में भी घूमना  है और हां चिड़ियाघर में भी घूमना है आपके साथ। और फिर शरारती आंखें नचाते हुए बोला- चिड़ियाघर में अगर उन्होंने मुझे बंद कर दिया तो आप भी तो मेरे साथ होंगीईईई तब आयेगा मज़ा। अपन दोनों शेर के साथ बैठकर डिनर किया करेंगे। 
अंशुल की बात सुनकर मैंने मुंह सिकोड़ते हुए कहा उहं वो तो नाॅन वैजिटेरियन होता है। 
हां ये तो मैंने सोचा ही नहीं चलो अपन अकेले ही खा लेंगे अंशुल ने मस्ती में सिर हिलाते हुए कहा। 
मैंने भी उसीके अंदाज़ में सिर हिलाते हुए कहा कि हां ये ठीक है। 
चलो और बताओ। और क्या-क्या मज़े करने हैं हमें। 
और? ऊंऊ बस इतना ही काफी है। मुझे घर जाकर पढ़ाई भी तो करनी है। दीदी मैं न जब से यहां आया हूं न, मेरी पढ़ाई का बहुत नुकसान हो गया। फिफथ क्लास में न मैं फस्र्ट आया था पर यहां आने के चक्कर में मेरे दो पेपर छूट गए हैं। कंपार्टमेंट आ जाएगी। दोनों हाथों पर अपने गाल टिकाए अंशुल अचानक से बहुत उदास हो गया था। मैंने उसके घुंघराले बालों में उंगलिया घुमाते हुए कहा अंशुल ----यार तुम तो बड़े समझदार निकले। अभी छटी क्लास में हो और पढ़ाई की इतनी टेंशन करते हो। अगर मैं भी तुम्हारे जैसी समझदार होती तो आज पता नहीं कहां से कहां पहुंच गई होती। 
मेरी बात सुनकर अंशुल ने उत्सुक्ता से अपना सिर उठाया और मेरी आंखों में झांककर बोला- कैसे? आप तो इतनी इंटेलीजेेंट हो। फिर?
मैंने भी मज़े लेते हुए कहा- छोड़ो न अंशुल तुमने किसी को बता दिया तो? सब हंसेंगे मेरे ऊपर। 
नहीं बताउंगा दीदी बताओ न प्लीज।
नहीं नहीं कोई और बात करते है। मैंने थोड़ा और भाव खाते हुए कहा। 
दीदी बताओ न? प्लीज़।़़़़ ़़अंशुल ने मेरा हाथ खींचते हुए कहा। 
अबके मैंने गंभीर होते हुए कहा- ओके चलो बताती हूं। पर किसी को बताना नहीं बहुत ही गंभीर किस्म की बात है। 
अंशुल ने मुझे आश्वासन देते हुए कहा पक्का दीदी। अब बताओ भी। 
मैंने बताना शुरू किया-
तो सुनो, जब न मैं आठवीं क्लास में थी तो तब मेरे मिड टर्म एग्ज़ाम थे। मैंने डेटशीट देखी नहीं ध्यान से। इसलिए जिस दिन हिंदी का एग्ज़ाम था मैंने सोचा कि आज तो छुट्टी है और सोती रही दिन भर। अगले दिन जब पेपर देने पहुंची तो पता पड़ा कि हिंदी का पेपर तो कल हो गया और आज तो गणित का पेपर है। 
क्या???????? दीदी आप सच कह रही हो? फिर क्या हुआ जब पापा को पता पड़ा?
कुछ नहीं पापा ने बस थोड़ी पीठ थपथपाई थी मेरी। 
अंशुल खिलखिलाकर हंसते हुए बोला- पीठ नहीं थपथपाइ्र्र होगी पिटाई की होगी।
मैंने कहा कि जो भी है। पीठ पर ही हुआ था तो मैं तो यही कहूंगी कि पीठ थपथपाई थी। 
ख़ैर मोरल आॅफ न स्टोरी ये है पेपर छूटने से कुछ नहीं होता। जो इंटैलिजैंट होता है वो पेपर छूटने के बाद भी इंटेलीजेंट ही रहता है। आगे सब कवर हो जाता है। आया समझ में -----मैंने दोनों हाथांे से उसके कान खींचते हुए कहा।
हां दीदी मैं सब कवर कर लूंगा। खूब पढ़ाई करूंगा देख लेना। अंशुल ने मस्ती में अपना सिर हिलाते हुए कहा। 
उसका उत्साह उसकी शीशे से चमकीली आंखों में ऐसे झलक रहा था जैसे सुबह के मासूम सूरज की हल्की किरणीली धूप उसकी आंखों में उतर आई हो। 
मैं जैसे एक पल के लिए खो गई थी। अचानक उसने मेरी नाक को पकड़कर कहा- क्या हुआ दीदी? मैंने भी उसका कान खींचते हुए कहा- नाॅटी ब्वाॅय!! और हम दोनों ही हंस पड़े। 
उस दिन के बाद क़रीब एक हफ्ते तक मैं उससे मिलने नहीं जा सकी। अंशुल से मिलने का मन तो बहुत होता था पर कई कारणों के चलते उससे मिलना संभव नहीं हो सका। एक ज़बर्दस्त विरोधाभासी सी स्थिति से गुज़र रही थी मैं उस समय। एक ओर काॅलेज की पढ़ाई तो दूसरी ओर उससे मिलने की आतुरता। उसके साथ कुछ वक्त गुज़ारने का लालच। और इसके साथ ही एक अजीब सा दर्द या शायद दर्द क़िस्म की कोई चीज़ जो बहुत तक़लीफ देती थी जब एम्स का वो दृश्य मेरी आंखों की पुतलियों से फिसलकर मस्तिष्क तक फैल जाता था। वो दमघोंटू माहौल। अस्पताल के बाहर और भीतर ऐसा लगता था जैसे कराहती हुई पूरी एक दुनिया सिमट आई हो और जिसकी कराहों से आस-पास की दुनिया को कोई बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। बिस्तरों पर पड़े मरीज़। मरीज़ों के रिश्तेदारों के थके और परेशान चेहरे। सफेद कोट और गले में आला लटकाए डाॅक्टरों की आवाजाही और---और इन सबके बीच मौसी-मौसाजी और------अंशुल-----
अस्पताल के एक बिस्तर पर अंशुल। ब्लड कैंसर की लाइलाज हो चुकी बीमारी से मुस्कुराकर लड़ता अंशुल। 
ठीक एक हफ्ते बाद मैं उससे मिली। हफ्ते भर में ही वो थोड़ा सा और कमज़ोर हो गया था। आंखों के नीचे काले घेरे मुझे अवाकृ कर रहे थे। पर सब नाॅर्मल है। यही तो दिखाना है मुझे। इतना तो मैं कर ही सकती हूं और अगर इतना भी नहीं कर सकती तो शायद कभी भी कुछ भी नहीं कर सकती। मैंने यही सोचा था उस वक्त ख़ैर---
म्ुाुुझे देखते ही उसकी मुरझाए चेहरे पर चमक आ गई। आंखें हीरों सी चमक उठीं। वो चहककर बोला। दीदीईईईई--- आप आ गईं। मैं कबसे आपका इंतज़ार कर रहा था। आप आईं क्यों नहीं मुझसे मिलने। अंशुल एकदम मुझसे लिपट गया। 
मैंने उसके हाथ में चाॅकलेट थमाते हुए कहा कि अंशुल मैं तुम्हें अब क्या बताऊं। बड़ी गड़बड़ हो गई। मेरे काॅलेज के सर को ये पता चल गया कि स्कूल में मैं पेपर देना भूल गई थी। इसलिए अब वो बहुत स्ट्रिक्ट हो गए हैं। कहते हैं कि स्कूल का पेपर छोड़ दिया सो छोड़ दिया पर काॅलेज का पेपर छोड़ा तो तुम्हारी ख़ैर नहीं। मैंने रुआंसा मुंह बनाते हुए कहा। 
सच्ची दीदी? अंशुल ने अपनी गोल-गोल आंखों को पूरा खोलते हुए कहा।
और नही ंतो क्या? मैंने संजीदगी से कहा। 
ओ दीदी यह तो समस्या हो गई तुम्हारे लिए!!
पर दीदी सर को कैसे पता चला?
पता नहीं अंशुल मैं भी यही सोच रही हूं। 
कहीं आपके स्कूल वाले सर ने तो नहीं बताया?
क्या पता? ख़ैर छोड़ो न आज तो आ गई हूं न क्या ये फालतू पढ़ाई-वढ़ाई की बात करनी। आज तो हम खूब मस्ती करंेगे। ठीक है न? 
हां ठीक है पर आप पूरा दिन यहीं रुकोगी न?
हां भाई पक्का। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा। 
दीदी मैं न यहां बहुत बोर हो जाता हूं। मुझे अच्छा नहीं लगता यहां। घर कब जाउंगा दीदी? अचानक से अंशुल ने बेहद थकी सी आवाज़ में कहा। पता नहीं क्यों मुझे उम्मीद नहीं थी कि वो ऐसा कुछ कहेगा। मुझे समझ ही नहीं आया कि उसकी इस बात का क्या जवाब दूं। कलेजा मुंह को आना क्या होता है, यह उस वक्त समझ आया था मुझे और तब अपने आवेग को बड़ी मुश्किल से रोकते हुए मैंने पूरी गंभीरता से उससे कहा कि बहुत जल्दी अंशुल। और अंशुल ये मैं नहीं कह रही हूं खु़द डाॅक्टर ने कहा मुझसे। 
नहीं दीदी आप झूठ बोल रही हो मुझसे। मुझे ये डाॅक्टर बिल्कुल अच्छे नहीं लगते। बहुत गंदे हैं। पता है दीदी जब वो मेरी कमर में छेद करते हैं न तो बहुत दर्द होता है। तीन बार कर चुके हैं वो मेरी कमर में छेद और जब मैं रोता हूं तो कहते हैं कि अभी तो और भी करेंगे। जब तक तुम्हारा बोनमैरो नहीं निकलता तब तक करेंगे। 
दीदी ये बोनमैरो क्या होता है? 
मैं अवाकृ सी उसकी बातें सुन रही थी। अपने प्रश्न का जवाब जानने की उसे उत्सुकता नहीं था वो तो अपना दर्द बताए जा रहा था। 
दीदी अब वो ड्रिल वाला आॅप्रेशन फिर से होगा। अचानक उसकी आंखों में चमक आ गई और वह बोला। दीदी पर एक बात बताऊं? अब न मुझे दर्द नहीं होता। पता है कैसे? जब न वो ड्रिल घुमाते हैं तो मैं खूब तेज चिल्लाता हूं तो दर्द न कम हो जाता है। है न अच्छा आइडिया? 
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूं? शब्दों की ऐसी कमी और भावों को छिपाने का ऐसा प्रयोग मेरी ज़िंदगी में अब तक नहीं हुआ था। असल में तो मुझे भी यूं लग रहा था कि बाहर जाकर मैं भी ज़ोर से चिल्लाऊं। ऐसी सुनसान जगह पर चली जाऊं जहां कोई न हो। मुझे लग रहा था कि मैं दुनिया की सबसे नकारा लड़की हूं। जिं़दगी की चाह लिए एक छोटा सा बच्चा मेरी आंखों के सामने दर्द और तकलीफ़ से मर रहा है, और मैं उसके सामने गप्पे हांक रही हूं। क्या वो यह सब समझता नहीं होगा? उफ्फ---
अंशुल तो अपनी बात कहे जा रहा था- दीदी मुझे अच्छा नहीं लगता। पता है पापा डाॅक्टरों के पैरों में पड़े रो रहे थे और कह रहे थे कि डौक्टर साब बचा लो मेरे इकलौते अंशुल को। और डाॅक्टर कह रहे थे ये नहीं बचेगा। 
दीदी मैं नहीं बचूंगा क्या? वैसे दीदी मुझे हुआ क्या है? जो भी हो दीदी मैं यहां नहीं रहना चाहता। यहां के डाॅक्टर बहुत बुरे हैं। ये डाॅक्टर मुझे कुछ नहीं करने देंगे। मुझ्रे अभी पेपर देने हैं। बड़े पापा से मिलने जाना है और दीदी मैट्रो, कुतुबमीनार और चिड़िया घर भ्ज्ञी तो देखना है। दीदी सुन रही हो न?
वो बोलता जा रहा था-- कहे जा रहा था अपनी बात और मैं पूरे ध्यान से उसकी बात सुनने का नाटक कर रही थी। ध्यान तो बस इसी ओर था कि आंख की पुतलियांे के पीछे छिपा आंसुओं का सैलाब कहीं पलकों से नीचे न उतर आए। फिर भी मैंने पूरे विश्वास के साथ अंशुल से कहा कि तुम बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे अंशुल और जिस डाॅक्टर ने तुमसे और मौसाजी से ऐसी बदतमीज़ी की थी न उसे बड़े डाॅक्टर ने बहुत बुरी तरह से डांटा। अब वो कभी ऐसे बात नहीं करेगा। तुम देखना। तुम बस जल्दी से ठीक हो जाओ फिर हम पिकनिक पर चलेंगे। खूब सारे गोल-गप्पे खांएगे। 
अंशुल भी जैसे पुरानी बात भूल गया और बोला हां दीदी और चाउमीन भी खांएगे खूब सारी। पक्का पर फिलहाल हम चिप्स तो खा सकते हैं न?
चिप्स?? कहां है?
आंखें बंद करो शायद मिल जाए। 
छोटे बच्चों की तरह अंशुल ने आंखें बंद कर लीं और मैंने अपने बैग से धीरे से चिप्स के पैकिट निकालकर उसकी गोद में रख दिए। अंशुल एक बार फिर खुशी से उछल पड़ा। उस दिन हमने ख़ूब मस्ती की। मैं अंशुल को लेकर वहां के गार्डन एरिया मंे गई मौसी-मौसाजी भी साथ थे। हम सबने साथ मिलकर वहीं खाना खाया। खाने में मम्मी ने ख़ास तौर से अंशुल की पसंद का ध्यान रखा था। खट्टे-मीठे अनुभवों को लिए वो दिन भी बीत गया। दिन अकेला नहीं बीता। उसके साथ बीती बहुत कुछ मैं और बहुत कुछ अंशुल भी। 
फिर एक लंबा अंतराल------
मैं मां से कहती रही कि मुझे अंशुल से मिलने जाना है, वो अकेला बोर होता है वहां, आप लोगों के जाने से कुछ नहीं होता वो मुझसे बहुत बाते करता है, इसलिए मिस करता होगा मुझे। पर मां का हर बार यही जवाब होता कि मिल लेना उससे ठीक है वो। डाॅक्टरों ने अभी मिलने से मना किया है। मैं और तुम्हारे पापा जा रहे हैं न! मुझे लगता कि मां इतनी रुखाई से क्यों बोल रही हैं। पर यह सुनकर अच्छा लगता था कि अंशुल अब ठीक है। मैंने सोचा कि चलो ठीक है कि उसकी स्थिति में सुधार है, वर्ना मैं तो कुछ और ही देख-सुन आई थी। एक बार थोड़ा स्वस्थ हो जाए फिर जहां उसका मन करेगा उसे घुमाने ले जाउंगी। 
पर दो-दिन बाद न जाने क्या हुआ मुझे। मैं क्लास में थी। सर के सामने की बैंच पर। अचानक से मुझे रोना आ गया। इतना रोना इतना कि क्या कहूं। मैं रोए जा रही थी। सब पूछ रहे थे कि क्या बात हो गई अचानक? तबीयत ठीक है वगैरह। पर मैं क्या बताती। मुझे खु़द ही नहीं पता था। ये अचानक से मुझे क्या हो गया मैं खु़द भी हैरान थी। ख़ैर घर आकर मैंने मां को भी रोते हुए और अपने आंसू छिपाते हुए देखा। वो रो रहीं थीं पर क्यों रो रहीं थीं ये मुझे नहीं बताना चाहती थीं। पर सच वही था जो मैं जान चुकी थी। 
अंशुल जा चुका था। उसी ड्रिल के दर्द से हारकर जिसे वो चिल्लाकर कम कर दिया करता था। पर उस दिन दर्द जीत गया और वो हार गया। ठीक दो दिन पहले ही। ठीक उसी वक्त जब क्लास में मैं रो पड़ी थी। विधि का कैसा विधान! जिन आंसुओं को मैं बेवजह समझ रही थी, वो बेवजह नहीं थे। इस दुनिया में शायद कुछ भी बेवजह नहीं होता। अंशुल अपने हिस्से के आंसू लेकर मुझसे विदा हो गया था। शायद मेरी आंखों में उमड़े आंसुओं के साथ वो यह कहने आया हो कि दीदी तुम नहीं आईं न मुझसे मिलने?
मस्तिष्क में शून्यता चिल्ला रही थी कि क्यों ज़िंदगी से भरपूर ज़िंदगी मौत के आगे हार जाती है। क्यों इस मौत को मासूम ज़िंदगियों पर तरस नहीं आता। क्यों जिं़दगी में कुछ ट्रांसफरेबल नहीं होता। अगर होता तो मैं अपनी ज़िंदगी उसे ट्रांसफर कर देती। पर नहीं यह सब फिज़ूल की बातें हैं। ऐसा कुछ नहीं होता। और अकसर जैसा हम चाहते हैं वैसा तो कभी भी कुछ नहीं होता। मुझे लग रहा था कि मैं भी कुछ-कुछ ख़त्म सी हो गई हूं। लग रहा था कि कहीं भी कुछ भी नहीं। कुछ समझ में आ रहा था तो बस नियति का घूमता चक्र जिसके आगे कोई कुछ नहीं है-----

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014


एक नदी की साधना

एक था पहाड़। ऊबड़-खाबड़, रूखा-सूखा एकदम नीरस. अपने इष्ट की तपस्या में लीन दुनिया से एकदम वीतरागी सा. और एक थी नदी. अल्हड सी, छल-छल करती, चांदी सी मुस्कुराती, बहुत ही चंचल. दोनों का कोई मेल नहीं। मौन, आत्मलीन, खोया-खोया सा पहाड़ और जीवन की धुन पे गुनगुनाती नदी. पर ईश्वर की माया! न जाने क्या हुआ उस  नदी को कि उस रूखे पहाड़ से प्रेम कर बैठी और सब कुछ भूल कर बन गई पहाड़ी नदी. नदी जानती है कि उसके पहाड़ ने उसे खींच लिया है अपनी ओर. लेकिन ये बात और किसी को नहीं पता. 
तभी तो किसी से भी पूछो तो सब यही कहते हैं कि  नदी तो अपने पहाड़ के साथ तब से है जबसे उसका पथरीला पहाड़।  उसी के संग जन्मी उसी में घुली मिली सी. तभी तो  उसी की खुशबु से महकती है वो नदी. पर देखो तो यह पहाड़। सच में बिलकुल अबोध ही तो है जो  उसे नदी के प्रेम का आभास तक नहीं। कहते हैं वो तो जबसे जन्मा है खुद में ही डूबा है और देखो तो नदी के आने के बाद भी यूं ही  डूबा हुआ है. पर लगता है नदी भी थोड़ी सी पगली है तभी तो इस पगले से प्रेम कर बैठी।  शायद नदी उसकी इसी अबोधता पर रीझ गई हो.…  भगवान जाने! 
 गुज़रती हवाएँ बताती हैं कि जब पहाड़ समाधिस्थ  होता तो नदी कैसे उसके रूखे पथरीले अंगों को अपने निर्मल जल से स्निग्धता प्रदान करती. पहाड़ चुपचाप ध्यानमग्न और नदी उसकी रुखाई को अपनी तरलता प्रदान करती। उसकी आग सी तपती देह को शीतल करती। पहाड़ निर्लिप्त नदी चंचल. पहाड़ मौन और नदी उसके मौन मन्त्रों को आत्मसात कर  अपना कल कल स्वर देती जैसी अपने आत्मस्थ शिव के लिए स्तोत्र गाती पार्वती और तब ऐसा लगता जैसे पूरा विश्व प्रेम के अदृश्य तंतुओं से बंध गया हो ।
इस विचित्र प्रेम को देख किसी ने कहा यही ओंकार है तो किसी ने कहा प्रकृति के प्रेम की अभिव्यक्ति।
ऐसे ही न जाने कितने युग बीत गए।  नदी यूं ही तपस्या करती रही साधना मेंलीन अपने निर्मोही वीतरागी तपस्वी की. और उसका तपस्वी  वैसे ही आत्मस्थ आत्मलीन वीतरागी और अबोध सा।
युगों बाद जब एक दिन अचानक उस रूखे आत्मस्थ पहाड़ की समाधि खुली तो अचंभित सा वह  क्या देखता हैकि उसकी रूखी तपती पथरीली देह यूं हिमालय कैसे हो गई? आअह  किसने अपने प्रेम रस से सींच दिया है  उसकी रूखी ऊबड़ खाबड़ आग सी तपती देह को।  पहाड़  हैरान।  और ये क्या इतना सौंदर्य ! जीवन के इतने रूप! कल- कल की अनुकृति में कलरव करते कितने मधुरगान।  उसी की सुगंध और दृढ़ता को धारण किये झूमते लचकते ये अनगिनत वृक्ष और वनस्पतियां ! कहाँ से आये सब ।   जीवन का ऐसा अनुभव !! पहाड़  गर्व से  झूम उठा कि ओह मेरे देव का वरदान है यह।  मेरी साधना का सुफल।
अपने इष्ट के भोलेपन पर नदी खिलखिलाकर हंस  पड़ी कहते हैं तभी से अल्हड नदी अपनी कलकल ध्वनि में अपने आत्मस्थ हिमालय के कान में कुछ कहती है पर वो अबोध पहाड़ फिर से समाधिस्थ हो गया है अपने देव से  एक और वरदान पाने  को। ....

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

गढ़ी गईं औरतें

सिन्दूर से रंगी पुती औरतें 
रंगे लाल होंठो से मुस्कुराती औरतें 
माथे पर चाँद सितारों में जगमगाती औरतें 
पायल की छम छम में गुनगनाती औरतें 
कितने विश्वास से बना देती हैं खुद को किसी और की जागीर 
और बदल देती हैं अपनी दुनिया ख़ुशी ख़ुशी 
इस एहसास से कि समर्पण ही एक औरत की जिंदगी का सार है 
और क्योंकि अब तक देखा भी है उन्होंने अपने सी औरतों को किसी के प्रेम में समर्पित होकर निस्सार हो जाना 
और ख़ुशी ख़ुशी 
मुर्दा घोषित कर देना खुद को पुरुष के आगे बेवजह यूं ही 
खैर
यूं भी नहीं आखिर 
पुरुष को अधिकार जो है उसके समर्पण का, उसके निस्सार हो जाने का  
तो गलत भी क्या है अगर औरत चलती है उसके नक़्शे कदम पर 
क्योंकि अब तक वो निभाती आई है परंपरा 
और आगे भी निभाती रहेगी यूं ही 
और फिर परंपरा और पुरुष में अंतर ही कहाँ है 
कि वह उसे चुनौती देने की कूवत रखे अपने समर्पण से परे जाकर… 
अव्वल तो वो निकल ही नहीं पाई है अपने खोल से,
कि देख सके जिंदगी की असली सच्चाई 
कि वो बेतरह गढ़ दी गई है जिसमे 
उसकी आत्मा तड़प के रह गई उसकी गढ़ी गई देह के बोझ के नीचे ...... 


मंगलवार, 11 जून 2013

मैंने खुशबुओं को समेटा था अपने आँचल में 
सितारों को सजा लिया था अपनी उँगलियों में 
इस विश्वास से कि जब भी जिंदगी मुर्झाएगी 
उसे खिला दूँगी अपने आँचल में सिमटी खुश्बुयों से 
और 
हर गहराते अँधेरे को दूर कर दूँगी अपनी उँगलियों में मुस्कुराते सितारों से 
पर नहीं जानती थी कि अँधेरा यूं घिरेगा यूं अचानक से 
कि मैं हैरान रह जाऊं
मगर---- खैर----- 
आज जबकि मैं जान चुकी हूँ कि 
अंधेरों में जिंदगी तड़प रही है
गहराते काले बादलों के बीच रौशनी सिमट रही है
मेरे खुश्बुयों में भीगे मासूम सितारे निकल पड़े हैं मौत और अंधेरों से दो दो हाथ करने …
मुझे अपनी रौशनी का विश्वास देकर
मैं जानती हूँ वो लौटेंगे
मगर उनके लौटने तक अँधेरा सहा नहीं जाता

रविवार, 28 अप्रैल 2013

उफ़ !! कब तक पैदा होती रहेंगी बेटियां इस पुरुषवादी समाज में 
जहाँ उसके बाप की टोपी उसके जनमते ही गिर जाती है 
और 
झुक जाता है उसका सर पुरुषवादी विचारों के तले 
उफ़ कब तक जीने की हिमाक़त करती रहेंगी बेटियां इस मर्दाने समाज में 
जहाँ जब जी चाहे कुचल दी जाती है उसकी जुबां पुरुषवादी रिवाजों के नीचे 
और मसल दिया जाता है उसका कोमल मन पुरुष के कट्टर, स्वार्थी अहम् के तले 
उफ़ कब तक आखिर कब तक---- 
तथाकथित इज्ज़त के प्रपंच में जकड़ी जाती रहेंगी बेटियां और
पुरुशिया रिवाजों में खुद को खोने पर मजबूर होती रहेंगी बेटियाँ
कब तक आखिर कब तक बलात्कार सह कर भी
जीने की नाकाम कोशिश करती रहेंगी बेटियां
जब कि वो जान चुकी हैं भले से कि
इस समाज में अपने आप को सहेज कर बने रहना अब मुश्किल हो गया है
और अब वो जी ही नहीं सकती इस तरहा खुद को रौंदे जाते देखकर
तो इसलिए..
कहीं बेहतर है कि इस दलदल को धता कर
पैदा होने से ही इनकार कर दें बेटियां
और पैदा हो भी गईं तो जीने से इनकार कर दें बेटियां ......

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

एक जिंदगी की मौत


 

मैं क्यों रोऊँ, क्यों दुःख व्यक्त करूँ 
उस लड़की की मौत पर 
जो जड़ते हुए एक झन्नाटेदार तमाचा 
हमारे सभ्य और सुरक्षित समाज पर 
हार गई है जिंदगी की जंग 
मौत से लड़ते लड़ते--
जबकि मैं यह जानती हूँ कि 
शोषण सहना, राह चलते, उठते-बैठते,
घर-बाहर, हर जगह, हर कहीं 
खून का घूँट पीकर 
यौनिक वास्तु के रूप में जीना 
और--
बलात्कार सहकर भी 
जीने की नाकाम कोशिश करना 
इस देश की लड़की की नियति है।
और इसके साथ ही--
अपने तथाकथित फिक्र्मंदों की 
'समर्पण कर देने', 'चुप्प रहने' और 'सलीकेदार कपड़े' पहनने की 
बेशर्म सलाह को तेज़ाब की तरह पीना 
इस देश की बेटी की किस्मत!!
तो --
इससे पहले कि मैं सुबक-सुबक के रोऊँ,
उसकी शक्ल में कहीं न कहीं खुद को देख तड़प तड़प के रोऊँ,
बेहतर है 
कि इस घिनौनी, खूंखार मर्दानी व्यवस्था को 
चकनाचूर कर दूं 
ताकि फिर
 कभी न हारे मेरी सपनों से भरी मासूम जिंदगी इस खूंखार मर्दानी मौत से---