शनिवार, 19 सितंबर 2015


                                  आन्ता

बहुत दूर तक वो मेरा पीछा करती रहीं। उनकी छुअन मेरे रोंगटे खड़े कर रही थी, मेरे क़दमों को लड़खड़ा रही थीं। एक पल को मुझे यूं भी लगा जैसे वो मेरी पीठ को चीरकर मेरे दिल तक पहुंच गई हों और उन्होंने मेरी धड़कन को अपनी गिरफ़्त में ले लिया हो। पर अफसोस धड़कन तब भी नहीं रुकी, और तेज़ हो गई जैसे वो भी भाग जाना चाहती हो उन आंखों की छुअन से।
उफ्फ,!! भला दो निगाहों में इतनी ताक़त कैसे हो सकती है कि वो भागते क़दमों को भी अपनी गिरफ़्त में ले लें। ज़रूर वो जादुई थीं वरना मैंने ऐसी आंखें इस जन्म में तो नहीं देखी थीं। सवालों की एक लंबी फेहरिस्त थी उन आंखों में। ठीक है। पर मुझसे क्या चाहती थीं वो? क्यों इस तरह मुझे असहज बना रहीं थी वो? क्यों मेरा पीछा कर रहीं थी वो और मैं? मुझे क्या हो गया था उन आंखों की छुअन से कि मैं और मेरी आराम से चलती सांस ठहर सी गई थी कुछ देर के लिए?...
.. कुछ तो था जो मेरी समझ के परे था। पर था ज़रूर कुछ ऐसा जो शायद मेरी ज़िंदगी का ही नहीं मेरी आत्मा का भी अंश था... वो रात यूं ही अंधेरों में रौशनी तलाशते हुए गुज़र गई और वो आंखें रात भर मेरे दिमाग़ में चक्कर लगाती रहीं पर नतीजा कुछ नहीं था..
         मैंने पढ़ा था कि अनगिनत भाषाओं में से चिरस्थायी कहें तो सिर्फ एक भाषा होती है, और वो है स्पर्श की भाषा। छुअन की भाषा। देह जिसे स्पर्श करती है उसका भाव, उसका गुणधर्म आत्मसात् कर लेती है। मस्तिष्क भूल जाता है पर देह नही भूलती। देह समाप्त हो जाती है पर उसकी स्मृतियां नहीं मरतीं। उसकी भाषा नहीं मरती। हर जन्म में उसकी युगों पुरानी, जन्मों पुरानी छुअन अपने चिरस्थायी होने का असर दिखा ही देती है। कभी उंगलियों की बनावट में, कभी लहज़े में और कभी गहरी निगाहों में। देह की भाषा है देह को छोड़कर कहां जाएगी? कभी दर्द के रूप में, कभी कंपन के रूप में देह संकेत करती है बहुत कुछ। अतीत और वर्तमान तो क्या भविष्य तक का संकेत दे देती है देह। पर इससे पहले कि हम कुछ समझें बहुत कुछ घट जाता है। उन आंखों की छुअन को मुझे एेसे ही लगा जैसे मेरी देह सदियों से जानती है बहुत अच्छे से पहचानती है। हां मेरा मस्तिष्क ज़रूर उन आंखों को भूल चुका था पर उन आंखों का गहरा स्पर्श शायद उसे अबतक याद था तभी तो वो ख़ुद भी बेचैन था और मेरी पूरी देह को बेचैन कर रहा था।
हर बात अपनी मां से शेयर करने वाली मैं नहीं समझ पा रही थी कि किसी से भी क्या कहूं। कुछ मेरी भी तो समझ आए कि यह सब क्या हो रहा है आजकल मुझे। राह चलते न जाने कितने लोगों से सामना होता है। पर मस्तिष्क में अब तक कोई ऐसे नहीं अटका था। उसकी वो आँखें, गहरी निगाहें वो जैसे मेरे मन को कुुरेद रहीं थीं। मुझसे कुछ कह रही थीं पर मैं नहीं समझ पा रही थी कुछ भी। बहुत असहज सी स्थिति थी यह। ... सबकुछ समझ के परे था। वो व्यक्ति जिसकी आंखों में मैं गुम हो चुकी थी, न जाने कौन था पर उसकी आंखें मुझसे परिचय स्थापित कर रही थीं।
हफ़्ता बीत गया, महिना और बीतते बीतते पूरे दो साल बीत गए। घटना कुछ पुरानी हो गई। पर वो आंखें नहीं बीतीं। मेरे मस्तिष्क में वो वैसे ही छाई हुईं थीं जैसे उस दिन जब वो मुझसे पहली बार मिली थीं और जब मैं उनसे भाग जाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। पर सच तो यह है मेरा मस्तिष्क उनमें कोई संबंध खोज रहा था और मैं उन्हें खोज रही थी अपने विगत में, अपने अतीत में। पर हासिल कुछ नहीं था सिवाय शून्य के।
पर उस दिन वो मुझे फिर मिलीं। मेरे घर के पास। जाने क्या था उनमें अजीब सा पैनापन कि लगा कि अंदर तक कुछ गहरे चुभ गया हो..अचानक ऐसा लगा जैसे सब कुछ घूम रहा है। घर, आकाश, ज़मीन सबकुछ। और फिर एक गहरा काला अंधेरा मेरी आंखों में समा गया। और फिर....... मुझे कुछ याद नहीं।
जब आंखें खुलीं तो देखा बिस्तर पर हूँ और सिर मां की गोद में। वो मुझे सहला रहीं थीं। मुझे होश में आया देख वो दुलारकर मुझसे बोलीं-_सोना, मेरी गुड़िया, मेरी रानू ....क्या हो गया था तुझे? देखो  सब कितने परेशान हो गए थे और अान्ता!! सोना, मेरी गुड़िया तुझे आन्ता...कहते कहते मां सुबक पड़ीं और कमाल हैै पापा ने भी कुछ नहीं कहा बस मां का हाथ अपने हाथ में ले लिया। कहते भी कैसे कुछ। दुनिया के स्ट्रांगेस्ट पापा आज खुद भी तो सुबक रहे थे... बच्चों की तरह।
मां क्या हुआ आप लोग एेसे क्यों बिहेव कर रहेे हो। हुआ क्या? मुझे नहीं समझ आ रहा था कि ये सब हो क्या रहा है? मां ने अपने आंसू पौंछते हुए कहा - कुछ नहीं सोना। सब ठीक है और मेरी ओर बगल में रखा दूध का गिलास बढ़ाते हुए बोलीं- चलो उठो दूध पी लो। कुछ नहीं खाया तुमने कलसे। मां जब ज्यादा दुलार करती हैं तो सोना, रानू और भी न जाने क्या क्या कहती हैं मुझे। तब मुझे लगता है कि ज़रूर कुछ बात है कि मां इतना प्यार जता रही हैं। इसीलिए कुछ आशंकित होते हुए मैंने कहा-  मां ये सब क्या है आप लोग ऐसे परेशान मत हुआ करो। कुछ नहीं हुआ मुझे मैं ठीक हूं। और आप न हंसते रहा करो बस। ओके। हां ठीक है। अब दूध पी लो प्रवचन हो गया हो तो। अबकी पापा बोले आवाज़ मेें बनावटी कड़कपन के साथ, जो कि साफ पता चल रहा था कि बनावटी है। अंदर तो कुछ और ही चल रहा था उनके जो वो छिपा नहीं पा रहे थे। पी रही हूं पापा कहते हुए मैंने गिलास मुंह से लगा लिया। मैैं जानती थी किसी के पेट में भी अन्न का दाना तक नहीं जाने वाला जब तक मुझे न खिला-पिला दें। उफ्फ प्रेम भी क्या चीज़ है। कितना असहाय बना देती है इंसान को। अब मांपा को ही देख लो। उनकी खुशी मुझ पर ही आश्रित है। मेरा चेहरा देख कर ही उनका दिन तय होता है। मांपा मैं भी आपको बहुत चाहती हूं। आप मेरी ज़िंदगी हो मांपा। पर मैं बहुत बुरी बेटी हूं मांपा। बहुत रुलाती हूं न आपको...दिमाग में यही सब चल रहा था कि जैसे एक झटका सा लगा और दिमाग़ में बिजली सी कौंध गई। मैंने दूध का गिलास एक ओर रखते हुए कहा-मैंने आन्ता को देखा मां.. मां मैंने आन्था.....कहते हुए मेरा गला रुंध गया। वो आन्ता... उसकी आंखें...मां वो आन्ता ही है.....मां........मां ने सुबकते हुए मुझेे अपने सीने से लगा लिया और बोलीं सोना तुझे सब याद आ गया...मैं मां के सीने से लगी बिलख रही थी। दो वर्ष पुराना वो अतीत जो मेरेे मस्तिष्क में जमकर बैठा था आज मेरी आंखों से पिघल पिघल के बाहर आ रहा था। गहरे अंदर से उठी कोई बहुत दर्दीली सी चीज़ जैसे मेरे गले से बाहर आ जाना चाह रही थी। पर अफसोस वो दर्दीली चीज़ जिसे शायद कलेजा कहते हैं, बाहर नहीं आया। कुछ बाहर आया तो वो अतीत, वो निगाहें जिनसे अनजाने ही.. मैं न जाने कबसे भाग रही थी। उफ्फ.. वो आंखें..वो गहरी निगाहें मेरे आशू, मेरे एंटोन की थीं जिनमें मेरी पूरी दुनिया समायी हुई थी। मेरी सुबह, मेरी शाम, मेरी पूरी ज़िंदगी जैसे उन भूरी आंखों के घेरों में खो गई थी वही आंखें.. जो मेरे दो साल के निक्कू के चेहरे में झलकती थीं, उफ्फ उनसे मैं कैसे दूर हो गई.. आह...... मेरी आत्मा का अंश, मेरी जान का टुकड़ा , मेरा मासूम सा निक्कू अपनी तोतली आवाज़ मेें आशू अपने प्यारे पापा को आन्ता कह कर बुलाता था। जब मैं आशू को उसकी बातों में छिपी कहानियों की वजह से एंटोन कहती थी तब निक्कू एंटोन कहने की कोशिश में आन्ता कहता और तब मैं और आशू बहुत हंसते..और फिर मैंने भी आशू को आन्ता कहना शुरू कर दिया था एन्टोन की जगह...जब मैं आशू को आन्ता कहती तो मेेरा सोना, मेरा छोटा सा निक्कू बहुत हंसता......... और फिर एक गहरा अंधेरा...... निक्कू अपने पापा की उंगली पकड़कर जा रहा है... पार्क...पर वो अपने आन्ता के साथ लौटा क्यों नहीं..मुझे..अपनी मां को बिना कुछ कहे वो चला कहां गया??.. उसका आन्ता कहां था जब मेरा छोटा सा निक्कू झूले से गिर गया था। आह.... वो पैना दृश्य जबकि  निक्कू अपने आन्ता के हाथों में हमेशा के लिए सो गया था, मेरे मस्तिष्क और आंखों में क्या ज़बान तक में जम गया था.. और..और मैं और उसके आन्ता उसे...उसे नहीं जगा पाए!! निक्कू जिसकी आंखें बिलकुल अपने आन्ता जैसी थीं कहां चला गया अचानक एेेसे...? ज़िंदगी के वो दो वर्ष जिन्हें मैं भुला बैठी थी अपनी पूरी तकलीफ़ के साथ मेरी ज़िंदगी में फिर से लौट आए थे।
अब से कुछ क्षणों पहले अपने मांपा को अपने लिए दुखी होता देख मैं सोच रही थी कि प्रेम इंसान को असहाय बना देता है। पर नहीं प्रेम केवल इतना ही नहीं करता। वो अगर करनेे पर आए तो व्यक्ति को विक्षिप्त तक बना डालता है...
मैंने महसूस किया कि मेरी हथेलियों को किसी ने अपनी हथेलियों में छुपा लिया है। अपनी गहरीली आंखों में ढेरों समुंदर समाए वो आशू था पर अफसोस उसकी आंखों में मेरा आन्ता नहीं था..


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